एक पुरानी, लेकिन विश्वसनीय कहानी, के मुताबिक़ इस अवसर का जश्न मनाने के लिए एक अर्मेनियाई व्यापारी, ख्वाजा मोर्टिनिफस ने उन्हें तोहफे में ओपोर्टो की शराब की पांच बोतलें दीं.
सम्राट इस तोहफे से बेहद खुश हुए और व्यापारी से पूछा कि वापसी के तोहफे के रूप में उसे क्या चाहिए.
ख्वाजा ने कहा कि उनके पास ईश्वर की कृपा से वो सब कुछ है जो वो चाहते हैं और सम्राट ने पहले ही उन्हें अपने साम्राज्य में व्यापार करने की अनुमति दे दी है.
जहांगीर ने उनकी टिप्पणी के लिए आभार व्यक्त किया, फिर भी उन्हें तोहफा देने की पेशकश की.
जहांगीर ने तोहफे के रूप में उन्हें गोलकोण्डा के खदान से निकला एक बेशकीमती हीरा दिया.
व्यापारी ने वो हीरा अपने संरक्षक मिर्ज़ा ज़ुल्करनैन को उपहार में दे दिया, जिन्हें अकबर अपना सौतेला भाई मानते थे और जिन्हें सम्बर (राजपुताना) का प्रशासक नियुक्त किया था, जहां मुगलों का नमक बनाने का कारखाना था.
अर्मेनिया के इसाई मिर्ज़ा ने उस हीरे को सोने की एक अंगूठी में जड़वाया जिसे वो लगभग पूरी ज़िंदगी पहनते रहे.
संयोग से जहांगीर दिल्ली में शेरशाह के पुत्र सलीम शाह के बनाए सलीमगढ़ में रहते थे, क्योंकि उस समय लाल किला नहीं था. इस किले के अवशेष अब भी मौजूद हैं.
गर्मियों में वो यमुना नदी पर नावों के बने एक अस्थायी शिविर में रहना पसंद करते थे.
अर्मेनियाई ईसाईयों के दिल्ली में दो गिरजाघर थे (दोनों 1739 में नादिरशाह ने नष्ट कर दिये).
वो क्रिसमस के दौरान नाटक का आयोजन करते थे, जिसमें मुगल रईस और राजपूत सरदार प्रमुख आमंत्रित लोगों में हुआ करते थे.
उन्होंने 1625-26 के नाटक में सम्राट को आमंत्रित किया, जिसके लिए जहांगीर तैयार हो गए.
क्योंकि वो अपने पिता के समय से आगरा में आयोजित ऐसे कार्यक्रमों में भाग लेते रहे थे.
फ्रांसिस्कन एनाल्स के रिकॉर्ड के मुताबिक, क्रिसमस की रात उस नाटक में परियों की वेषभूषा में छोटे बच्चों और बच्चियों ने भाग लिया. नाटक देखने के लिए आमंत्रित सम्राट पर गुलाब की पंखुड़ियों की वर्षा की गई.
इससे पहले, "क्रिसमस की सुबह वो अपने दरबारियों के साथ उस गुफा का नमूना देखने के लिए आए, जिसमें यीशु का जन्म हुआ था और जिसपर चरवाहों की नज़र पड़ी थी. बाद में उनके हरम की महिलाओं ने भी उस मंजीरे का दौरा किया".
एक बार जहांगीर ने लाहौर के चर्च में मोमबत्तियां का उपहार दिया, जिन्हें घंटियों की तरह सजाया गया, घंटियों की झंकार और कैरोल गीत हुए".
Tuesday, December 25, 2018
Wednesday, December 12, 2018
छत्तीसगढ़ के चावल वाले बाबा जो दाने-दाने वोट के लिए तरसे
इस चुनाव ने न सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'अजेय' छवि को तोड़ा है बल्कि छत्तीसगढ़ में 2003 से सत्ता पर काबिज रहने वाले चावल वाले बाबा के रूप में मशहूर डॉ. रमन सिंह को भी बेदखल कर दिया है. इसका मतलब यह हुआ कि बीजेपी में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड बना चुके रमन सिंह का कभी अभेद्य लगने वाला किला ढह चुका है. राजनीति में सक्रिय होने से पहले अपनी डिस्पेंसरी में लोगों का इलाज करने वाले डॉक्टर रमन सिंह के लिए सत्ता से बाहर होने का यह पहला अनुभव है.
'दाने- दाने' वोट के लिए तरसे रमन
जनता को बेहद सस्ती दर पर चावल मुहैया कराने वाले रमन सिंह को सूबे में एक- एक वोट के लिए संघर्ष करना पड़ा. उनकी अगुवाई में बीजेपी की हार कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस से बीजेपी को 10 फीसदी कम वोट मिले. चुनावी गणित में इसे बड़ा अंतर माना जाता है. कांग्रेस को जहां 43 फीसदी तो बीजेपी को 33 पर्सेंट वोटों से संतोष करना पड़ा. कांग्रेस ने बीजेपी से करीब 14 लाख ज्यादा वोट हासिल किए. यह छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य के लिहाज से बड़ा आंकड़ा है.
कई सीटों पर तीसरे नंबर पर खिसका 'कमल'
तमाम सीटों पर बीजेपी न सिर्फ कांग्रेस से पीछे रही बल्कि वह बीएसपी जैसी पार्टियों से भी पिछड़ गई और तीसरे नंबर पर रही. 15 वर्षों तक सूबे में राज करने वाली बीजेपी के लिए यह बड़ा धक्का है.
8 मंत्री चुनाव हारे
जनता के गुस्से का निशाना बने बीजेपी के 8 मंत्री चुनाव हार गए. रमन सरकार के सिर्फ तीन मंत्री ही विधानसभा पहुंच पाए हैं. राजनांदगांव में रमन सिंह मुश्किल से जीत पाए. उनकी जीत का अंतर 17 हजार वोटों से भी कम रहा.
आदिवासी इलाकों में सूपड़ा साफ
छत्तीसगढ़ की 90 में से आदिवासी इलाकों में पड़ने वाली 29 सीटों पर बीजेपी का प्रदर्शन बहुत खराब रहा. सरगुजा और बस्तर संभाग की कुल 26 सीटों में बीजेपी को महज एक सीट मिली. बस्तर संभाग की 12 सीटों में बीजेपी को सिर्फ 1 सीट और सरगुजा संभाग की 14 सीटों पर तो बीजेपी का खाता भी नहीं खुल पाया.
'दाने- दाने' वोट के लिए तरसे रमन
जनता को बेहद सस्ती दर पर चावल मुहैया कराने वाले रमन सिंह को सूबे में एक- एक वोट के लिए संघर्ष करना पड़ा. उनकी अगुवाई में बीजेपी की हार कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस से बीजेपी को 10 फीसदी कम वोट मिले. चुनावी गणित में इसे बड़ा अंतर माना जाता है. कांग्रेस को जहां 43 फीसदी तो बीजेपी को 33 पर्सेंट वोटों से संतोष करना पड़ा. कांग्रेस ने बीजेपी से करीब 14 लाख ज्यादा वोट हासिल किए. यह छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य के लिहाज से बड़ा आंकड़ा है.
कई सीटों पर तीसरे नंबर पर खिसका 'कमल'
तमाम सीटों पर बीजेपी न सिर्फ कांग्रेस से पीछे रही बल्कि वह बीएसपी जैसी पार्टियों से भी पिछड़ गई और तीसरे नंबर पर रही. 15 वर्षों तक सूबे में राज करने वाली बीजेपी के लिए यह बड़ा धक्का है.
8 मंत्री चुनाव हारे
जनता के गुस्से का निशाना बने बीजेपी के 8 मंत्री चुनाव हार गए. रमन सरकार के सिर्फ तीन मंत्री ही विधानसभा पहुंच पाए हैं. राजनांदगांव में रमन सिंह मुश्किल से जीत पाए. उनकी जीत का अंतर 17 हजार वोटों से भी कम रहा.
आदिवासी इलाकों में सूपड़ा साफ
छत्तीसगढ़ की 90 में से आदिवासी इलाकों में पड़ने वाली 29 सीटों पर बीजेपी का प्रदर्शन बहुत खराब रहा. सरगुजा और बस्तर संभाग की कुल 26 सीटों में बीजेपी को महज एक सीट मिली. बस्तर संभाग की 12 सीटों में बीजेपी को सिर्फ 1 सीट और सरगुजा संभाग की 14 सीटों पर तो बीजेपी का खाता भी नहीं खुल पाया.
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